You are here
Home > फिल्म समीक्षा > लखनऊ सेंट्रल : सपनो को ज़िंदा रखना

लखनऊ सेंट्रल : सपनो को ज़िंदा रखना

इस शुक्रवार सिल्वर स्क्रीन पर दस्तक दी है फरहान अख्तर अभिनीत लखनऊ सेंट्रल ने ,जिसका सीधा मुकाबला कंगना अभिनीत सिमरन से है ,अब देखना दिलचस्प होगा तक़रीबन 2000 स्क्रीन्स पर रिलीज़ हुई लखनऊ सेंट्रल क्या अपने 32 करोड़ के बजट को रिकवर कर पाती है या नही ।
कहानी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की लिखी गयी है जहां का रहने वाला किशन गिरहोत्रा यानी फरहान अख्तर एक गायक बनना चाहता है और साथ ही साथ अपना एक बैंड भी बनाना चाहता है अर्थात कहे तो यही उसका सपना है,वह लोक गायक मनोज तिवारी का बहुत ही बड़ा फैन है , जब एक बार वह उनके म्यूजिक कॉन्सर्ट में जाता है तो उस दौरान एक आईएएस अधिकारी की मृत्यु हो जाती है जिस का सीधा आरोप किशन पर लगता है जिस कारण किशन को डिस्ट्रिक्ट जेल में बंद कर दिया जाता है और कुछ दिनों के बाद लखनऊ सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया जाता है ,अब लखनऊ सेंट्रल जेल में किशन की मुलाकात गायत्री यानी डायना पेंटी से होती है जो कि एक एनजीओ चलाती है  ,गायत्री 15 अगस्त को होने वाले प्रदेश भर के अलग-अलग जेल के कैदियों द्वारा बनाए गए बैंड की परफॉर्मेंस के कार्यक्रम के लिए कैदियों को प्रोत्साहित भी करती है ,इसी बीच किशन जेल के बाकी साथियों जैसे दीपक डोबरियाल, इनामुल हक, गिप्पी ,राजेश शर्मा के साथ लखनऊ सेंट्रल नामक एक बैंड बनाता है लेकिन यह बात जेलर यानी रोनित रॉय को पता चलती है तो वह इन कैदियों को और प्रताड़ित करने लगता है और उनके मिशन को नाकामयाब करने में लग जाता है वही 15 अगस्त को पूरे प्रदेश के अलग-अलग कैदी बैंड परफॉर्म करते हैं और अंत में क्या क्लाइमेक्स सामने आता है ? क्या किशन बेगुनाह साबित हो पाता है ? यह जानने के लिए आपको फिल्म को देखना होगा ।
इंटरवल तक फिल्म का प्लॉट अच्छा है जबकि सेकंड हाफ में खींचा हुआ सा लगता है ,फिल्म का स्क्रीनप्ले लचीले किस्म का है  ,फिल्म के ज्यादातर डायलॉग्स निराश करते है  लेकिन ‘लोग कैद होते हैं सपने नहीं, शहर छोटे होते हैं सपने नहीं’ डॉयलॉग से पता चलता है कि फिल्म अपने सपनों को जिंदा रखने की सीख दे जाती है । सिनेमेट्रोग्राफी एवं आर्ट वर्क बेहद कमाल के है ,जेल के अंदर के दृश्य बड़ी सहजता से दिखाये गये है । फरहान अख्तर ने हमेशा की तरह अपने अभिनय कों चमकाये रखा है वही डायना पेंटी ने कॉकटेल के बाद वापसी की है जो अपना असर छोड़ जाती है ,सहायक भूमिकाओं में एनामुल हक़ ,रोनित रॉय एवं राजेश शर्मा ने अपना काम बखूबी निभाया है ।
फिल्म का म्यूजिक कुछ ख़ास नही रहा है कोई भी गीत चार्टबस्टर नही गया है जबकि कुछ जगह बैकग्राउंड म्यूजिक रोचकता उत्पन्न तो करता है लेकिन क्लाइमैक्स का कमजोर हो जाना फिल्म पर भारी पड़ सकता है । मैं लखनऊ सेंट्रल को पांच में से ढाई स्टार देता हूँ ।

Mudit Bansal
Engineer By Education| Lyricist | Critic| Author | Art in Heart |
Top