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Review – इंदु सरकार : राजनीति की परिभाषा

Indu Sarkar Review By Mudit Bansal - Bollywood Galiyara

इस शुक्रवार सिल्वर स्क्रीन पर दस्तक दी है इंदु सरकार ने,जब से इस फिल्म की घोषणा हुई है तभी से यह फिल्म विवादों में रही है जिसका मुख्यतः कारण इसका टाइटल होना है और जबसे फिल्म का ट्रेलर आया है एक राजनीतिक दल ने इसका विरोध किया है ,ज्ञात हो फिल्म को कल ही रिलीज़ होने की अनुमति मिली है । पेज 3, चांदनी बार, फैशन,कारपोरेट जैसी कई फिल्में बनाकर नेशनल अवार्ड जीत चुके निर्देशक मधुर भंडारकर ने एक बार फिर से एक अलग मुद्दा उठाया है,इस बार उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की काली घटनाओ से परे इमरजेंसी के दौर पर वार किया है ,1975 से 1977 के बीच भारत में लागू की गई इमरजेंसी के दौरान हुई घटनाओ को एक काल्पनिक किरदार के माध्यम स्क्रीन पर उतारा है ।

फिल्म की कहानी 27 जून 1975 से शुरू होती है जब देश में इमरजेंसी लगाई गई थी , इंदु यानी कीर्ति कुल्हार का बचपन एक अनाथ की तरह गुजरा है और उसे रुक-रुक कर बोलने की आदत है, इंदु के पति बने है नवीन जो कि एक सरकारी ऑफिसर है अर्थात मंत्रियों के सलाहकार बने है , सरकारी ऑफिसर होने के नाते उनकी भी अपनी एक अलग विचार धारा है जबकि इस विचार धारा से इंदु सहमत नही है, इसी दौरान कुछ ऐसा हादसा होता है

Indu Sarkar

जिसकी वजह से इंदु अपने पति को छोड़कर भारत में लगे इमरजेंसी के खिलाफ आवाज उठाती है और देशहित के लिए आगे निकल जाती है ,बहुत सारे उतार चढ़ाव के बीच इमरजेंसी के दौरान नसबंदी और मीडियाबंदी के साथ साथ बाकी कई तरह की घटनाओं पर प्रकाश डालने की अच्छी कोशिश की गयी है एवं अंततः इमरजेंसी के खत्म होते वक़्त कुछ सवालों को जिन्दा रखते हुए दिखाया गया है। फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती इसका स्क्रीनप्ले है क्योंकि हम अक्सर बचपन से  सुनते आये हैं कि इमरजेंसी में देश ने किस तरह का दर्द झेला है, उस दर्द को पर्दे पर बहुत ही भावनात्मक रूप में निर्देशक ने दर्शाया है । ‘गाँधी के मायने बदल गए है’ ,’गरीबों को जीने का हक़ नही है ‘समेत तमाम डायलाग फिल्म की यूएसपी कही जा सकती है ।
निल नितिन मुकेश का गेटअप देखते ही एक प्रचलित नेता की याद आ जाती है जो की अपनी अदायगी से सबको प्रभावित करते दिखे है जबकि अभिनेत्री कीर्ति कुल्हाड़ी ने बहुत ही बेहतरीन अभिनय किया है । फिल्म का संगीत भी 70 के दशक के लिहाज से देखा जाये तो बेहतर माना जायेगा , एक तरफ ‘चढ़ता सूरज वाली कव्वाली’ तो दूसरी तरफ मोनाली की आवाज से सजे ‘ये आवाज है’ गीत पूरी फिल्म में बैकग्राउंड में बजता रहता है जो की एक रोचकता उत्पन्न करता है ।
कुल मिलाकर यह फिल्म एक बार तो जरूर देखने को बनती है क्योंकि यह देश के सबसे बड़े काले साये से गुजरते हुए वक़्त की कहानी है जिस पर मधुर भंडारकर के नाम का टैग लगा है ,मैं इंदु सरकार को पांच में से साढ़े तीन स्टार देता हूँ ।

Mudit Bansal
Engineer By Education| Lyricist | Critic| Author | Art in Heart |
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