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TubeLight : LED के दौर में Tubelight में रौशनी कहाँ …!

सलमान खान और ईद का कॉम्बो पैक हमेशा से ही प्रसिद्ध रहा है जिसकी वजह से सल्लू की फिल्म को बेहतरीन ओपनिंग हमेशा से ही मिलती आई है और जब यह बात निर्देशक कबीर खान और सलमान खान की जोड़ी के साथ हो तो बॉक्सऑफिस पर ईदी भरपूर मात्रा में मिलने की उम्मीद की जाती रही है , इस बार यह जोड़ी हाजिर है ट्यूबलाइट लेकर ..इससे पहले दोनों एक था टाइगर एवं बजरंगी भाईजान लेकर आ चुके है ।ज्ञात हो ट्यूबलाइट को भारत में तक़रीबन 4350 स्क्रीन्स पर रिलीज़ किया गया है एवं इसको हॉलीवुड फिल्म लिटिल बॉय से प्रेरित बताया जा रहा है अब देखना दिलचस्प होगा कि इस LED के दौर में Tubelight कितना उजाला दे पाती है ?


कहानी लक्ष्मण (सलमान खान) की है जिसे आस पड़ोस के बच्चे ट्यूबलाइट के नाम से पुकारते/चिढ़ाते हैं क्योंकि लक्ष्मण को बातें थोड़ी देर से समझ में आती है जो कि कुमाऊं के छोटे से शहर जगतपुर में रहते हैं, लक्ष्मण के भाई है भरत सिंह बिष्ट जिसकी भूमिका निभायी है सोहेल खान ने ,इनके मां- पिता की बचपन में ही मृत्यु हो चुकी है। लिहाजा, ये एक दूसरे के लिए पूरी दुनिया हैं। खैर…यदि इंसान के दिल में यकीन हो, तो वह चट्टान भी हिला सकता है..महात्मा गांधी जी के सिद्धांतो से लक्ष्मण को गहरा लगाव हो जाता है अर्थात उनके अंदर यकीन का सिलसिला जन्म लेता है ।कहानी में मोड तब आता है जब भारत- चीन में युद्ध छिड़ा हुआ होता है  लक्ष्मण के भाई भरत को फौज में रख लिया जाता है और उसे भारत- चीन युद्ध में सरहद पर भेज दिया जाता है,जिसके वापस आने की कोई उम्मीद नही होती लक्ष्मण पूरी तरीके से भावुक हो उठता है और उसकी भरपूर कोशिश होती है कि किसी भी कीमत पर वह अपने भाई को वापस लाये वैसे लक्ष्मण को पूरा यकीन है कि उसका भाई जंग से जरूर वापस आएगा। इस यकीन में लक्ष्मण का समय समय पर साथ देते हैं बन्ने खान चाचा (ओम पुरी), जादूगर शाशा (शाहरूख खान) और शी लिंग (जू जू ), लेकिन क्या लक्ष्मण का यकीन सही साबित होता है? क्या भरत जंग के मैदान से वापस आ पाता है..क्लाइमेक्स में क्या होता है ?इसके लिये आपको फिल्म को देखना होगा ।
स्क्रीनप्ले के मुताबिक फिल्म बिखरी बिखरी सी नजर आती है
इंटरवल से पहले और इंटरवल के बाद किरदार अलग-अलग दिशाओं में भटकते रहते है फिल्म के कुछ शुरूआती संवाद काफी प्रभावित करने वाले हैं, लेकिन यकीन शब्द की पुनरावृत्ति बोरियत महसूस कराने लगती है हालांकि कबीर खान ने फिल्म को अलग तरह से पेश करने की कोशिश  की है जिसमें ज्यादातर इमोशनल माहौल को तरजीह दी गयी है जिस कारण फिल्म पूरी तरह भावनात्मक शैली में बनायी गयी है ।फिल्म की सिनेमाटोग्राफी कमाल की है पहला सीन ही बजरंगी भाईजान की याद दिला देता है सिनेमेट्रोग्राफी ही फिल्म में मजबूती प्रदान करती है ।
बात अदाकरी की करे तो ज़ाहिर सी बात है कि पूरी फिल्म सलमान खान के कंधों पर टिकी है और छोटे से बच्चे सा दिमाग लिए वो इस किरदार में जमते तो हैं पर उनकी मासूमियत से दर्शक खुद को कनेक्ट नही कर पाते ख़ासकर
उनके एक तबके का फैन वर्ग जिन्हें सलमान खान दबंगपने के किरदार में ही पसंद आते है । सोहैल खान ने कोई यादगार सीन तक नही दिया है जबकि स्वर्गीय अभिनेता ओमपुरी का काम काबिले तारीफ है ,बाल कलाकार में मतीन ने सशक्त अभिनय किया है , शाहरुख खान का कैमियो ही एकमात्र दृश्य है जिसमे दर्शक ताली बजाने/सीटी मार सकते है वही ब्रिजेन्द्र काला एवं यशपाल शर्मा ने अपना काम बखूबी निभाया है ।फिल्म का संगीत भी निराशाजनक ही रहा है जिस कारण कोई भी गीत चार्टबस्टर नही गया है ,जहां तिनका तिनका कुछ हद तक प्रभाव डालता है वही दूसरी ओर आतिफ असलम की आवाज में सजे ‘मैं अगर ‘ को लिरिक्स के मद्देनजर याद रखा जा सकता है । ईद के मौके पर सलमान की फिल्म का हिट होना तय माना जाता है क्योंकि अधिकतर सलमान के फैन्‍स को स्क्रिप्ट से ज्यादा लगाव नही होता ,उन्हें तो सिर्फ सलमान को सिल्वर स्क्रीन पर देखने से मतलब है । कुल मिलाकर एक अच्छी सोच रखने के बावजूद फिल्म कहानी के मद्देनजर निराशा ही उत्पन्न करती है वैसे इस LED के जमाने में TubeLight से ज्यादा रोशनी की उम्मीद करना बेईमानी ही होगा ,मैं ट्यूबलाइट को पांच में से दो स्टार देता हूँ ।

Mudit Bansal
Engineer By Education| Lyricist | Critic| Author | Art in Heart |
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