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Movie Review: Dear Maya – खुद से मुलाक़ात बेहद जरूरी

[yasr_overall_rating]इस शुक्रवार सिल्वर स्क्रीन पर दस्तक दी है तक़रीबन 8 फिल्मो ने ,जिसका खामियाजा प्रत्येक फिल्म को उठाना पड़ेगा । जिनमे से एक मुख्यतः फिल्म डिअर माया जिसको निर्देशित किया है सुनैना भटनागर  ने ,इससे पहले वो इम्तियाज अली को असिस्ट कर चुकी हैं ।
कहानी अना और इरा नाम की दो लड़कियों की है जो शिमला में रहती है ..जैसा अक्सर होता है सभी टीनएज गर्ल्स की तरह रोमांटिक नावेल पढ़ना ..मस्ती करना ..हसींन सपने बुनना इनकी आदतों में शुमार है वही पड़ोस में माया (मनीषा ) नाम का एक और किरदार भी है जो अक्सर कुत्ते और पक्षियों के पिंजड़े से लगाव रखती है या कहे वही उसके दोस्त है ।अना माया की ज़िन्दगी में दिलचस्पी दिखाती है जिसका अतीत काफी दुखद रहा है जो काफी लंबे समय तक प्रभाव कायम रखता है ।अब दोनों सहेलियां इरा और अना कुछ ऐसा करना चाहती है जिससे कि माया की बेरंग ज़िन्दगी में फिर से रंग सजे । इरा के कहने पर अना एक काल्पनिक शख्स के नाम से माया को प्रेमपत्र लिखने लगती हैं। चीजें भयानक रूप में तब बदल जाती है जब माया को भी उस काल्पनिक नाम के शख्स से प्यार हो जाता है जबकि उसे नहीं पता कि वो शख्स तो है ही नहीं ।

अना की धीरे धीरे माया से अच्छी दोस्ती भी होने लगती है पर उसे अपनी इस हरकत का पछतावा भी है, लेकिन इसके पहले कि वो माया के सामने अपनी गलती जाहिर करे, माया अपने प्रेमी को खोजने निकल पड़ती है पर…! इस घटना से अना और इरा की दोस्ती पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ साल गुजर जाने के बाद अना दिल्ली में पढ़ाई कर रही होती है साथ ही माया को ढूंढती भी है , वहीं दूसरी ओर इरा को भी अपनी दोस्त को खो देने का पछतावा भी है क्योंकि अकसर दोस्तों को भूलना आसान नही होता । क्या दोनों की दोस्ती हो पाती है ? और माया कहां है ? इन सवालों के जवाब के लिये आपको फिल्म को देखना होगा ।
स्क्रीनप्ले के मुताबिक इंटरवल तक फिल्म में रोमांच बना हुआ है पर इंटरवल के बाद फिल्म ने अपनी दिशा खो दी है ,फिल्म की रफ़्तार काफी धीमी है खासकर जब किरदार बिखरे बिखरे नजर आते है । फिल्म की एडिटिंग तो कड़ी है पर ज्यादा उत्सुकता नही जगा पाती ।
मनीषा कोइराला की अदाकरी ही फिल्म के अंत तक बांधे रखती है खासकर उनका एक चाट वाला सीन ,जो काफी समय तक याद रखा जा सकेगा । अन्य कलाकारों में श्रेया सिंह और मादिहां ने अपना काम बखूभी निभाया है ।
फिल्म का म्यूजिक फिल्म की कहानी के मुताबिक ही  रखा गया है जो की क्लास ऑडिएंस को कनेक्ट कर सकता है रेखा भारद्वाज की आवाज से सजे ‘सात रंगो से’ गाना बेहतरीन है  जबकि ‘कहने दो’ को भी गुनगुनाया जा सकता है ।कुल मिलाकर एक रोचक कहानी ,सभी को अपनी ज़िंदगी से मोहब्बत करना,खुद से मुलाक़ात करना एवं किसी की ज़िन्दगी में खुशी शब्द का क्या महत्व है ,जैसे संदेश देने के बावजूद फिल्म दर्शको को टिकट खिड़की पर लाने में नाकामयाब रहेगी इसका मुख्यतः कारण फिल्म का बहुत ही कम स्क्रीन पर रिलीज़ होना है । फिल्म को एक विशेष वर्ग खासकर क्लास ऑडियंस के लिये ही बनाया गया है ,कहानी की रोचकता ही फिल्म की मुख्य यूएसपी कही जा सकती है । मैं फिल्म को पांच में से तीन स्टार देता हूँ ।

Mudit Bansal
Engineer By Education| Lyricist | Critic| Author | Art in Heart |
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