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फिल्म से पहले सिनेमाघरों में चलाया जाए राष्ट्रगान: हर्ष नागर

फिल्म से पहले सिनेमाघरों में चलाया जाए राष्ट्रगान: हर्ष नागर

‘राष्ट्रगान जन-गण-मन भारत की आजादी का अभिन्न हिस्सा है। इसे पूर्ण सम्मान देना और इसके सम्मान की रक्षा करना भारत के हर नागरिक का कर्तव्य है।’ यह बात हम सभी भले ही अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन आजकल यह मसला इसलिए सुर्खियों में है, क्योंकि इसे लेकर एक युवा अभिनेता ने मानो एक मुहिम छेड़ रखी है। बाॅलीवुड के ये युवा अभिनेता हैं हर्ष नागर, जिनकी फिल्म ‘लव डे’ देश भर में 23 सितंबर को रिलीज होनेवाली है। हर्ष नागर का कहना है कि फिल्म शुरू करने से पहले सिनेमा घरों में राष्ट्रगान चलाना अनिवार्य किया जा। अपनी इस मांग को लेकर इस युवा अभिनेता ने कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिख चुके हैं। इतना ही नहीं, इस मांग से संबंधित पत्र हर्ष नागर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ केंद्रीय मंत्रियों वेकैया नायडू, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, अरुण जेटली को भी लिखा है।

हर्ष नगर बताते हैं कि कुछ साल पहले मैं दक्षिण भारत गया था। वहां एक थियेटर में फिल्म देखने गया, तो पाया कि वहां फिल्म चलाने से पहले राष्ट्रगान चलाया जाता है और मुझसे राष्ट्रगान के दौरान सीट से खड़ा होने को कहा गया। उसके कुछ समय बाद वर्ष 2010 में जब मैं मुंबई शिफ्ट हुआ, तो वहां के सिनेमाघरों में मुझे यही कुछ देखने को मिला। मुंबई में भी फिल्म शुरू होने से पहले सिनेमाघरों राष्ट्रगान चलाया जाता है, जिससे लोगों में देश के प्रति सम्मान जाग्रत होता है। इस आशय का एक पत्र मैंने दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी लिखा था, लेकिन दुर्भाग्य से उस परत्र पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। अब इसी मांग को लेकर मैंने प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति समेत देश के हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं राज्यपालों को पत्र लिखा है। इस मामले में दिल्ली के उपराज्यपाल ने मिलने का समय भी मुझे दे दिया है।
अपने इस मुहिम को लेकर हर्ष नागर कितने संजीदा हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह बताते हैं कि प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 की धारा तीन के मुताबिक, अगर कोई राष्ट्रगान में विघ्न डालता है या किसी को राष्ट्रगान गाने से रोकने की कोशिश करता है, तो उसे ज्यादा से ज्यादा तीन साल कैद की सजा या जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। हालांकि, इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य किया जाए। बेशक इस दौरान भारतीयों से उम्मीद की जाती है कि वह राष्ट्रगान के समय सावधान की मुद्रा में खड़े रहें, लेकिन यह कहना गलत होगा कि जन-गण-मन न गाना इसका अपमान है।

हालांकि, हर्ष नागर यह भी कहते हैं कि राष्ट्रगान को लेकर ऐसा कोई नियम नहीं है कि इस दौरान आपको खड़े रहना है। जन-गण-मन के दौरान इसे सम्मान देना जरूरी होता है, न कि खड़े रहना। यानी, राष्ट्रगान को गाते या बजाते समय बैठे रहना अपराध नहीं है, बल्कि इस दौरान किसी भी अनुचित गतिविधि में संलग्न नहीं होना चाहिए। थियेटरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान की परंपरा को लेकर भी ऐसा कोई नियम नहीं है कि इस दौरान खड़े रहना जरूरी नहीं है, क्योंकि खड़े होने से फिल्म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्ट्रगान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी। अगर राष्ट्रगान किसी बंद जगह पर या छत के नीचे गाया जाता है तो नागरिक इसके सम्मान में बैठे भी रह सकते हैं।
हर्ष नागर सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बारे में बताते हैं कि अगस्त 1986 में बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल नाम के चर्चित वाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा था कि क्या किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है? इस केस में तीन स्टूडेंट्स को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने जन-गण-मन गाने से इनकार किया था। ये स्टूडेंट्स राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े जरूर होते थे, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर उसे गाने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला स्टूडेंट्स के हक में सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिससे किसी की धार्मिक भावनाएं आहत होती हों। कोर्ट के मुताबिक अगर कोई राष्ट्रगान नहीं गाता है, लेकिन उसका सम्मान करता है, तो अर्थ यह नहीं कि वह इसका अपमान करता है। इसलिए राष्ट्रगान गाने के लिए न ही उस व्यक्ति को दंड दिया जा सकता है और न ही प्रताड़ित किया जा सकता है। साथ ही कोर्ट ने तीनों स्टूडेंट्स को स्कूल में वापस जाने की अनुमति दी।

Rakesh Sharma
Obsessed Social Media Activist, Bollywood Blogger, Also love to right on Social issues, Technology & Gadgets, Politics & Entertainment
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