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फिल्म समीक्षा : ‘कबाली’ उतार-चढ़ाव विहीन स्क्रीनप्ले में बड़े-बड़े छेद

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रजनीकांत की हर फिल्म रिलीज होने के पहले उनके फैंस पर रजनी का बुखार चढ़ जाता है। वे दीवानगी की सारी हद पार कर जाते हैं। आखिर रजनीकांत महानायक जो ठहरे। स्क्रीन पर उन्होंने भौतिक शास्त्र (फिजिक्स) के नियमों को उलट-पुलट कर रख दिया, लेकिन उनकी यही अदाएं तो दिल जीतती हैं।

किसी भी निर्देशक का सपना रहता है कि रजनीकांत को लेकर कमर्शियल फिल्म बनाई जाए। रजनीकांत के रूप में उसे ऐसा कलाकार मिलता है जिससे वह जो चाहे करवा सकता है क्योंकि वे अगर-मगर, किंतु-परंतु जैसे तर्कों से परे हैं। यदि रजनीकांत चलती ट्रेन को भी पकड़ कर रोक दें तो कोई प्रश्न नहीं करेगा।

लेखक और निर्देशक पी. रंजीत को यह सुनहरा अवसर मिला। अफसोस की बात है कि उन्होंने यह अवसर बरबाद कर दिया है। आश्चर्य होता है कि रजनीकांत को लेकर कोई इतनी खराब फिल्म भी बना सकता है। उड़ने के लिए उनके पास खुला आसमान था। महानायक, बड़ा बजट और रजनीकांत के अनगिनत फैंस, इसके बावजूद वे उड़ान भी नहीं भर सके।

पहली रील से ही फिल्म प्रभावित नहीं कर पाती। उम्मीद बंधी रहती है कि अब गाड़ी पटरी पर आएगी, अब सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता और फिल्म खत्म हो जाती है।

रजनीकांत कबाली नामक गैंगस्टर बने हैं। जिनके कुछ उसूल है। वे देह व्यापार और ड्रग्स के खिलाफ हैं। मलेशिया में उनका साम्राज्य है। ’43 गैंग्स’ को कबाली की यह बातें पसंद नहीं आती। वे कबाली की गर्भवती पत्नी रूपा (राधिका आप्टे) को मार देते है और कबाली को 25 साल की जेल हो जाती है। कबाली 25 वर्ष बाद छूटता है और ’43 गैंग्स’ से अपना बदला लेता है। मनमोहन देसाई की फिल्मों की तरह उसे पता चलता है कि न केवल उसकी पत्नी जिंदा है बल्कि उसकी अपनी बेटी भी है।

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इस साधारण से रिवेंज ड्रामे को रंजीत ने लिखा है। उतार-चढ़ाव विहीन स्क्रीनप्ले में इतने बड़े-बड़े छेद हैं कि हाथी भी निकल जाए। मलेशिया की सड़कों पर खून-खराबा होता रहता है और पुलिस फिल्म की शुरुआत और अंत में ही नजर आती है। कबाली की पत्नी अपने पति से मिलने की कोशिश क्यों नहीं करती? इस तरह के कई प्रश्न दिमाग में उठते हैं।

चलिए, महानायक रजनीकांत की फिल्म है इसलिए तर्क-वितर्क की बातें जाने देते हैं, लेकिन रजनीकांत की फिल्म में जो स्टाइल, एक्शन, रोमांच होता है वो भी यहां से नदारद है। क्लाइमैक्स में ही रजनीकांत को हाथ खोलने का मौका मिला है। फिल्म में फैमिली ड्रामा को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया है और दर्शकों को भावुक करने की गैर जरूरी कोशिश की गई है।

निर्देशक के रूप में भी रंजीत असफल रहे हैं। वे कहानी को ठीक से परदे पर नहीं उतार पाए। रजनीकांत के स्टारडम का उपयोग नहीं कर पाए। बजाय अपने लेखन और निर्देशन के उन्होंने स्लो मोशन शॉट्स और बैकग्राउंड म्युजिक के जरिये रजनीकांत के किरदार को स्टाइलिश बनाने की कोशिश की है।

रजनीकांत की चमक से ही वे चौंधिया गए और यह बात भूल गए कि मनोरंजक फिल्म बनाने के लिए क्या जरूरी होता है। फिल्म पर उनकी पकड़ कही नहीं दिखाई देती। फिल्म की गति इतनी धीमी है कि सिनेमाहॉल से आप दस मिनट बाहर घूम भी आएं तो आपको कहानी जहां की तहां मिलेगी। चाहें तो आप झपकी भी निकाल सकते हैं। रंजीत का प्रस्तुतिकरण किसी बी ग्रेड फिल्म की तरह है। हां, एक काम उन्होंने अच्छा किया कि ज्यादातर समय उन्होंने रजनीकांत को उनकी उम्र के अनुरूप दिखाया।

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रजनीकांत पर उम्र हावी हो गई है। वे कमजोर भी नजर आएं। हर दृश्य को उन्होंने स्टाइलिस्ट बनाने की कोशिश की है। वर्षों बाद अपनी पत्नी से मिलने वाले सीन में उनका अभिनय देखने लायक है। राधिका आप्टे का रोल ज्यादा लंबा नहीं है, बावजूद इसके वे अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। टोनी ली के रूप में विंस्टन चाओ अपनी खलनायकी दिखाते हैं। धंसिका ने फिल्म में कबाली की बेटी का किरदार निभाया है। उनकी फिल्म में एंट्री जोरदार है, लेकिन बाद में उनके रोल का ठीक से विस्तार नहीं किया गया है।

सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है। संपादन बहुत ढीला है और कई जगह निर्देशक पर संपादक हावी लगता है। गाने याद रखने लायक नहीं हैं। बैकग्राउंड म्युजिक से कान और सिर में दर्द हो सकता है।

कबाली का तकिया कलाम है ‘बहुत खूब’, लेकिन मजाल है जो आपके मुंह से ये शब्द फिल्म देखते समय एक बार भी निकल जाएं। बहुत ही निराश करती है ‘कबाली’।


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